‘आप उसे कभी भी बाहर कर सकते हैं’: विराट कोहली और रोहित शर्मा को लेकर एमएस धोनी का बयान, चयन नीति पर गहराता सवाल

MS Dhoni का बड़ा बयान: विराट कोहली और रोहित शर्मा को लेकर चयन नीति पर क्यों उठे सवाल

भारतीय क्रिकेट में जब भी नेतृत्व, चयन नीति और सीनियर खिलाड़ियों के भविष्य की बात होती है, तो बहस अपने आप भावनाओं से जुड़ जाती है। यह खेल सिर्फ रन, विकेट और ट्रॉफी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भरोसे, सम्मान और समय पर लिए गए फैसलों का भी खेल है। हाल ही में सामने आए एमएस धोनी के एक बयान ने इसी संवेदनशील मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। “You can chuck him out anytime” जैसी लाइन पहली नजर में भले ही साधारण लगे, लेकिन इसके पीछे भारतीय क्रिकेट की पूरी चयन सोच और मौजूदा मैनेजमेंट के फैसलों पर सवाल छिपा हुआ है।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब टीम इंडिया बदलाव के दौर से गुजर रही है। पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े नाम टीम से बाहर हुए हैं और युवाओं को तेजी से मौके मिले हैं। चयन समिति और टीम मैनेजमेंट की कोशिश है कि आने वाले वर्षों के लिए एक मजबूत और युवा टीम तैयार की जाए, लेकिन इस प्रक्रिया में सीनियर खिलाड़ियों की भूमिका और उनके सम्मान को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। धोनी का बयान इसी संतुलन की कमी की ओर इशारा करता है।

एमएस धोनी भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल कप्तानों में से एक रहे हैं। उन्होंने न सिर्फ आईसीसी ट्रॉफियां जिताईं, बल्कि एक ऐसा सिस्टम तैयार किया जिसमें खिलाड़ी खुद को सुरक्षित और भरोसेमंद महसूस करते थे। धोनी की कप्तानी का सबसे बड़ा गुण यही रहा कि उन्होंने सीनियर और जूनियर खिलाड़ियों के बीच संतुलन बनाए रखा। उनका मानना हमेशा रहा है कि टीम सिर्फ आंकड़ों से नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती और अनुभव से भी जीतती है।

विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे खिलाड़ी इस अनुभव का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। विराट कोहली ने पिछले एक दशक में भारतीय क्रिकेट को जिस आक्रामकता और फिटनेस कल्चर से जोड़ा, उसने पूरी टीम की सोच बदल दी। कोहली सिर्फ एक रन मशीन नहीं रहे, बल्कि उन्होंने जीतने की आदत और दबाव में खेलने का आत्मविश्वास भी टीम को दिया। धोनी और कोहली के रिश्ते में गुरु-शिष्य जैसी झलक कई बार देखने को मिली है, जहां मतभेद के बावजूद सम्मान हमेशा बना रहा।

रोहित शर्मा की भूमिका भी इससे अलग नहीं है। उन्हें अक्सर शांत कप्तान कहा जाता है, लेकिन उनकी रणनीतिक समझ और खिलाड़ियों को सही भूमिका देना उन्हें खास बनाता है। रोहित ने सीमित ओवरों के क्रिकेट में कई बार दिखाया है कि वह बड़े टूर्नामेंट में टीम को कैसे संभाल सकते हैं। धोनी की सोच में रोहित जैसे खिलाड़ी सिर्फ मैदान पर प्रदर्शन नहीं करते, बल्कि ड्रेसिंग रूम में स्थिरता भी लाते हैं।

धोनी के बयान का असली संदर्भ यही है कि किसी खिलाड़ी को टीम से बाहर करना बेहद आसान है, लेकिन उसके अनुभव और मानसिक योगदान को रिप्लेस करना उतना ही मुश्किल। “आप उसे कभी भी बाहर कर सकते हैं” का मतलब यह नहीं है कि सीनियर खिलाड़ी टीम से बड़े हैं, बल्कि यह कि उन्हें बाहर करने से पहले उसके प्रभाव को समझना जरूरी है। धोनी मानते हैं कि अचानक लिए गए फैसले टीम के आत्मविश्वास को चोट पहुंचा सकते हैं।

इसके उलट गौतम गंभीर और अजीत अगरकर की सोच ज्यादा कठोर और भविष्य-केंद्रित मानी जाती है। गंभीर कई बार खुलकर कह चुके हैं कि टीम से ऊपर कोई खिलाड़ी नहीं होता और अगर प्रदर्शन गिरता है, तो अनुभव भी बचाव नहीं कर सकता। उनका मानना है कि अगर समय रहते बदलाव नहीं किया गया, तो टीम आने वाले वर्षों में पिछड़ सकती है। अजीत अगरकर भी चयन समिति में रहते हुए युवाओं को प्राथमिकता देने की बात करते रहे हैं।

यही सोच का फर्क इस पूरी बहस की जड़ है। एक तरफ धोनी का नजरिया है, जो अनुभव और सम्मान को अहम मानता है, वहीं दूसरी तरफ गंभीर-अगरकर की सोच है, जो भविष्य और निरंतर प्रदर्शन पर जोर देती है। दोनों ही दृष्टिकोण अपने-अपने तरीके से सही हैं, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब संतुलन बिगड़ जाता है।

भारतीय क्रिकेट इतिहास गवाह रहा है कि जब भी सीनियर खिलाड़ियों को अचानक बाहर किया गया, उसका असर टीम पर पड़ा है। चाहे वह सौरव गांगुली का दौर हो या राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण का अंतिम चरण, हर बार चयन फैसलों ने विवाद को जन्म दिया। धोनी शायद इसी इतिहास से सीख लेने की बात कर रहे हैं।

विराट कोहली को लेकर मौजूदा बहस खास तौर पर इसलिए तेज है क्योंकि उनके आंकड़े अब भी उन्हें टीम का अहम हिस्सा साबित करते हैं। भले ही कुछ फॉर्म में उतार-चढ़ाव रहा हो, लेकिन बड़े मैचों में कोहली का रिकॉर्ड आज भी मजबूत है। ऐसे खिलाड़ी को सिर्फ उम्र या बदलाव के नाम पर बाहर करना चयनकर्ताओं के लिए आसान फैसला नहीं होगा।

रोहित शर्मा के मामले में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। कप्तान होने के नाते उनकी जिम्मेदारी सिर्फ बल्लेबाजी तक सीमित नहीं है। टीम की रणनीति, खिलाड़ियों का मनोबल और बड़े टूर्नामेंट में निर्णय लेना उनकी भूमिका का हिस्सा है। धोनी जानते हैं कि ऐसे खिलाड़ी को हटाने से पहले टीम को मानसिक रूप से तैयार करना जरूरी होता है।

धोनी का बयान इस बात की ओर भी इशारा करता है कि चयन प्रक्रिया पारदर्शी और सम्मानजनक होनी चाहिए। अगर किसी खिलाड़ी को बाहर किया जा रहा है, तो उसके पीछे साफ वजह और भविष्य की स्पष्ट योजना होनी चाहिए। अचानक और बिना संवाद के लिया गया फैसला न सिर्फ खिलाड़ी को, बल्कि पूरी टीम को प्रभावित करता है।

फैंस के बीच भी इस मुद्दे पर राय बंटी हुई है। कुछ लोग मानते हैं कि अब समय आ गया है कि भारतीय क्रिकेट पूरी तरह युवाओं के भरोसे आगे बढ़े। वहीं कई फैंस धोनी की सोच का समर्थन करते हुए कहते हैं कि सीनियर खिलाड़ियों को सम्मानजनक विदाई मिलनी चाहिए। सोशल मीडिया पर यह बहस लगातार तेज हो रही है और हर नया बयान आग में घी डालने का काम कर रहा है।

क्रिकेट एक्सपर्ट्स भी इस मामले में एकमत नहीं हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि चयनकर्ताओं को भावनाओं से ऊपर उठकर फैसले लेने चाहिए। वहीं कुछ मानते हैं कि धोनी जैसे अनुभवी लीडर की बातों को नजरअंदाज करना सही नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने भारतीय क्रिकेट को सफलता के शिखर तक पहुंचाया है।

इस पूरे विवाद के बीच एक बात साफ है कि भारतीय क्रिकेट को संतुलन की जरूरत है। न तो सिर्फ अनुभव के भरोसे आगे बढ़ा जा सकता है और न ही सिर्फ युवाओं पर दांव लगाकर तुरंत सफलता की उम्मीद की जा सकती है। धोनी का बयान इसी संतुलन की याद दिलाता है।

आने वाले महीनों में जब चयन समिति बड़े टूर्नामेंट के लिए टीम का चयन करेगी, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि किस सोच को प्राथमिकता दी जाती है। क्या धोनी की तरह अनुभव को महत्व मिलेगा या गंभीर-अगरकर की तरह बदलाव को तेज किया जाएगा, यह आने वाला समय बताएगा।

अंततः एमएस धोनी का यह बयान किसी एक खिलाड़ी के समर्थन या विरोध में नहीं है। यह भारतीय क्रिकेट के सिस्टम को लेकर एक चेतावनी है कि फैसले जल्दबाजी में नहीं, बल्कि सोच-समझकर लेने चाहिए। विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे खिलाड़ी सिर्फ नाम नहीं, बल्कि एक दौर की पहचान हैं, और किसी भी दौर का अंत सम्मान के साथ होना चाहिए।

भारतीय क्रिकेट की असली ताकत हमेशा से संतुलन रही है। जब अनुभव और युवा जोश साथ आए हैं, तब टीम ने दुनिया पर राज किया है। धोनी का बयान इसी विरासत को बचाने की कोशिश है। अब यह चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट पर निर्भर करता है कि वे इस संदेश को कैसे समझते हैं और भारतीय क्रिकेट को किस दिशा में ले जाते हैं।

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