Abhishek Bachchan ने दिखावे से ज्यादा असलियत पर दिया जोर; Rishab Sharma ने ET Now Global Business Summit 2026 में संगीत और मानसिक स्वास्थ्य की अहमियत बताई

भारत का तेजी से बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम, उभरती स्पोर्ट्स लीग्स और फैलती क्रिएटिव इंडस्ट्रीज अभूतपूर्व अवसर दे रही हैं, लेकिन अभिनेता और निवेशक Abhishek Bachchan के अनुसार असली सफलता आखिरकार “प्रामाणिकता और अनुशासित जोखिम लेने” पर ही निर्भर करती है।

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Abhishek Bachchan at ET NOW Global Business Summit 2026

नई दिल्ली में आयोजित ET NOW Global Business Summit में बोलते हुए Abhishek Bachchan ने फिल्म स्टार से उद्यमी और स्पोर्ट्स टीम मालिक बनने तक के अपने सफर पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि उनकी निवेश सोच ट्रेंड के पीछे भागने से ज्यादा अपने भरोसे और समझ पर आधारित रहती है।

उन्होंने कहा कि जिन उत्पादों में उनकी दिलचस्पी होती है, वे आमतौर पर वही होते हैं जिन्हें वे खुद इस्तेमाल करते हैं। उनके मुताबिक कई निवेश बोर्डरूम की रणनीति से नहीं, बल्कि रोजमर्रा के उपभोक्ता अनुभव से शुरू हुए।

आज के दौर में, जब मार्केटिंग में जानकारी की भरमार और सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट हावी हैं, उन्होंने विश्वसनीयता को सबसे अहम बताया। उनका मानना है कि कहानी और इरादे की सच्चाई ही लंबे समय तक असर छोड़ती है, और जिस चीज़ का वे खुद उपयोग नहीं करते, उसे प्रमोट करना उनके लिए ईमानदार नहीं होगा।

जोखिम को लेकर उन्होंने सरल सिद्धांत साझा किया—अगर आप खुद किसी चीज़ का खर्च नहीं उठा सकते, तो उसमें कदम नहीं रखना चाहिए। उनके अनुसार जोखिम का आकलन करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि पहले खुद से पूछें: क्या मैं इसे वहन कर सकता हूँ? अगर जवाब ना है, तो जोखिम बहुत बढ़ जाता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर उन्होंने संतुलित लेकिन सतर्क रुख दिखाया। उन्होंने माना कि एनीमेशन और स्पेशल इफेक्ट्स जैसे क्षेत्रों में इसके फायदे हैं, लेकिन गलत इस्तेमाल रचनात्मक पेशों के लिए चुनौती बन सकता है। उनका कहना था कि इंसान की छोटी-छोटी कमियां ही फिल्मों को जीवंत बनाती हैं, जबकि पूरी तरह AI से बना कंटेंट कहीं न कहीं उस “आत्मा” की कमी महसूस कराता है जो दर्शकों को जोड़ती है।

पश्चिमी या कोरियाई कहानी कहने की शैली की नकल करने के बजाय Abhishek Bachchan का मानना है कि भारतीय सिनेमा को अपनी मौलिक पहचान को और मजबूत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैसे ही हम अपनी भारतीयता से समझौता करते हैं, हम अपनी खासियत खो देते हैं। RRR जैसी फिल्मों की वैश्विक सफलता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि “पूरी तरह भारतीय” होना ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी अलग पहचान बनाता है।

जहाँ Abhishek Bachchan ने बिज़नेस और सिनेमा में प्रामाणिकता की बात की, वहीं समिट के अगले सत्र में प्रामाणिकता के एक और पहलू—आंतरिक सच्चाई—पर चर्चा हुई। अनुशासित जोखिम से लेकर भावनात्मक मजबूती तक, बातचीत बोर्डरूम से निकलकर संगीत और आत्मिक संतुलन तक पहुँच गई, यह दिखाते हुए कि अपने प्रति सच्चे रहना व्यक्तिगत जीवन में भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना निवेश फैसलों में।

भारत की सदियों पुरानी शास्त्रीय संगीत परंपरा आज भी प्रासंगिक है, और सितार वादक Rishabh Rikhiram Sharma के लिए यह आधुनिक मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने का निजी साधन बन गई है।

ET NOW Global Business Summit के लाइव सेशन में, जहाँ बातचीत और प्रस्तुति का अनोखा मेल था, शर्मा ने बताया कि कोविड-19 के कठिन दौर से निकलने में संगीत ने उनकी बड़ी मदद की। उन्होंने हल्के अंदाज़ में कहा कि उस समय थेरेपी, संगीत और एक्सरसाइज—इन तीनों के मेल ने उन्हें उस दौर से बाहर आने में सहारा दिया।

हालाँकि वे संगीत को औपचारिक इलाज के रूप में सुझाने से बचते हैं, लेकिन अपने जीवन पर उसके असर को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं। उनके अनुसार संगीत ने उनके मानसिक संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है।

उनका यह व्यक्तिगत अनुभव अब एक बड़े उद्देश्य में बदल चुका है—मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित, सितार आधारित इमर्सिव अनुभव तैयार करना।

दर्शकों की प्रतिक्रियाओं ने भी संगीत की भावनात्मक ताकत पर उनका भरोसा और मजबूत किया है। उनके मुताबिक कई लोग उनके शो के दौरान गहरी भावनात्मक प्रतिक्रिया महसूस करते हैं, और वह अनुभव उसी पल में घटित होता है।

परफॉर्मेंस के अलावा वे ध्वनि के वैज्ञानिक पहलुओं पर भी काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि सितार संगीत का ब्रेनवेव और ईसीजी पर असर समझने के लिए रिसर्च चल रही है, हालांकि ठोस नतीजे आने में अभी कुछ साल लगेंगे।

आजकल भक्ति संगीत उनके रचनात्मक काम का बड़ा हिस्सा बन गया है, लेकिन वे खुद को किसी एक शैली तक सीमित नहीं मानते। उन्होंने कहा कि वे हिप-हॉप भी उतना ही पसंद करते हैं और Kanye West व Playboi Carti जैसे कलाकारों को सुनते हैं। उनका मानना है कि युवाओं में भक्ति संगीत की बढ़ती दिलचस्पी एक बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत है—जहाँ नई पीढ़ी कम शराब पी रही है और स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान दे रही है, और यह रुझान उसी का स्वाभाविक परिणाम है।

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शाम का समापन जब “ॐ नमः शिवाय” के मंत्रोच्चार और “शिव कैलाश” की लाइव प्रस्तुति के साथ हुआ, तो Rishabh Rikhiram Sharma ने दर्शकों को भव्यता नहीं, बल्कि एक शांत अनुभव देकर विदा किया—जैसे याद दिलाते हुए कि शोर से भरे दौर में ठहराव खुद एक ताकत बन सकता है।

Rishabh Rikhiram Sharma ने कहा कि आज हम हर समय अत्यधिक उत्तेजना और व्यस्तता के बीच रहते हैं, और ऐसे अनुभव लोगों को एक छोटे से विराम की तरह राहत देते हैं, जहाँ वे खुद से जुड़ पाते हैं।

समिट के उस शांत और आध्यात्मिक माहौल के बाद चर्चा सिर्फ संगीत तक सीमित नहीं रही, बल्कि इस बात तक पहुँच गई कि आज के दौर में “रुकना” भी एक कौशल बन गया है। लगातार नोटिफिकेशन, तेज़ काम की रफ्तार और सोशल मीडिया की मौजूदगी ने लोगों को हमेशा सक्रिय रहने की आदत डाल दी है। ऐसे में कुछ मिनट का ठहराव भी मानसिक रूप से गहरा असर डाल सकता है।

इस संदर्भ में Rishabh Rikhiram Sharma का मानना है कि कला का असली उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अनुभव पैदा करना है। Rishabh Rikhiram Sharma के अनुसार जब दर्शक किसी धुन में डूबते हैं, तो वे सिर्फ सुन नहीं रहे होते, बल्कि अपने भीतर चल रही भावनाओं को पहचान भी रहे होते हैं। यही वजह है कि उनके लाइव सेशन में कई लोग बाद में बताते हैं कि उन्हें मानसिक हल्कापन या स्पष्टता महसूस हुई।

Rishabh Rikhiram Sharma ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में इस तरह के इमर्सिव संगीत अनुभव और ज्यादा लोकप्रिय हो सकते हैं, क्योंकि लोग अब केवल कंटेंट नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण अनुभव तलाश रहे हैं। खासकर युवा पीढ़ी, जो पहले से ही माइंडफुलनेस, योग और वेलनेस की ओर झुकाव दिखा रही है, ऐसे आयोजनों को तेजी से अपनाती दिख रही है।

एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि संगीत के जरिए सामूहिक अनुभव लोगों को आपस में जोड़ता है। जब एक ही जगह बैठे सैकड़ों लोग एक ही धुन पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो एक तरह की सामूहिक ऊर्जा बनती है, जो व्यक्तिगत स्तर से आगे जाकर साझा भावनात्मक जुड़ाव पैदा करती है। यही जुड़ाव लोगों को यह एहसास दिलाता है कि वे अपनी चुनौतियों में अकेले नहीं हैं।

इसके अलावा, वेलनेस इंडस्ट्री में भी संगीत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। मेडिटेशन ऐप्स, साउंड थेरेपी सेशन और लाइव साउंड बाथ जैसे कॉन्सेप्ट अब मुख्यधारा में आ चुके हैं। यह ट्रेंड दिखाता है कि लोग मानसिक स्वास्थ्य को केवल समस्या के रूप में नहीं, बल्कि जीवनशैली के हिस्से के रूप में देखने लगे हैं।

समिट के इस सत्र ने एक और अहम बात उजागर की—सफलता और उत्पादकता की चर्चा जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है संतुलन और आत्म-देखभाल पर बात करना। बिज़नेस और करियर की दुनिया में भी अब यह समझ बढ़ रही है कि लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन के लिए मानसिक स्थिरता जरूरी है।

अंत में, यह अनुभव एक सरल लेकिन गहरी सीख देकर गया: शांति हमेशा किसी बड़े बदलाव से नहीं आती, बल्कि छोटे-छोटे विरामों से भी आ सकती है। चाहे वह कुछ मिनट का संगीत हो, गहरी सांसें हों या बस थोड़ी देर का मौन—ये पल हमें फिर से केंद्रित होने और नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने में मदद करते हैं।

अधिक जानकारी और पूरा सेशन पढ़ने के लिए आधिकारिक कवरेज देखें: ET Now Global Business Summit

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